कहानी कागज़ की कहने को तो मैं कागज़ कहा जाऊ, किसी के दर्द को किसी के गमो को खुद से लपेटे जाऊ, किसी का संदेश किसी की यादों का पैगाम लेकर जाऊ, किसी के आँसूओ में किसी के गमो में डूबता जाऊ, किसी के तोड़ें से किसी के मोड़े से मुड़ जाऊ, कहने को तो मैं कागज कहा जाऊ। किसी के सजाने से किसी के बिगाड़े बिगड़ जाऊ, किसी के इश्क़ को किसी के राज़ को छिपाते जाऊ, किसी की आग से किसी की बात से मैं जलता जाऊ, कहने को तो मैं कागज कहा जाऊ। किसी की किस्मत को किसी ज़िन्दगी को मैं संवारता जाऊ, किसी के अर्श पर किसी के फर्श पर मैं पाया जाऊ, किसी के मकान में किसी की दुकान में मैं ही दिखता जाऊ, कहने को तो मैं कागज कहा जाऊ। किसी के सफर पर किसी की डगर पर मैं ही तो साथ निभाता जाऊ, किसी की मंज़िल को किसी की राह को मैं ही तो दिखाता जाऊ, किसी के खाने में किसी के कूड़े में मैं ही तो जाऊ, कहने को तो मैं कागज कहा जाऊ। कहने को तो मैं बस कागज कहा जाऊ।।।।।।।।
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