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शायद मैं किसी रिश्ते के लायक नही....

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 शायद मैं किसी रिश्ते के लायक नही, माँ बाप के लिए अच्छा बेटा बनने के लायक नही, कुछ कमा कर लाने के लायक नहीं, कुछ दूर चलकर खुद ही सम्भलने के लायक नही, शायद मैं किसी रिश्ते के लायक नही। बहनों के लिए अच्छा भाई बनने के लायक नही, छोटी सी खुशी उनकी पूरी करने के लायक नही, कुछ दर्द उनका मैं मिटाने लायक नही, शायद मैं किसी रिश्ते के  लायक नही। पत्नी के लिए मैं अच्छा पति बनने के लायक नही, छोटी छोटी बातें उसे मैं समझाने के लायक नही, खुद को बदलकर सबको खुश करने के मैं लायक नही, शायद मैं किसी रिश्ते के मैं लायक नही। दुश्मनी के लिए भी मैं लायक नही, दोस्ती में भी मैं किसी के काम आने लायक नही, शायद मैं किसी रिश्ते के  लायक नही। शायद मैं किसी रिश्ते के  लायक नही।।।।।।।।

कस्ती चली दिन रात....

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 कस्ती चली दिन रात रे कस्ती चली दिन रात रे, मांझी ढूंढे पतवार रे कस्ती चली दिन रात रे, लहरो से करती बात रे कस्ती चली दिन रात रे, हवाओ को लेके साथ रे कस्ती चली दिन रात रे, अपनी रहो को पहचान रे कस्ती चली दिन रात रे, पंछियों से करती  बात रे कस्ती चली दिन रात रे, अपने सपनों के साथ रे कस्ती चली दिन रात रे, मांझी ढूंढे प त वार रे कस्ती चली दिन रात रे.........

कहानी कागज़ की

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कहानी कागज़ की कहने को तो मैं कागज़ कहा जाऊ, किसी के दर्द को किसी के गमो को खुद से लपेटे जाऊ, किसी का संदेश  किसी की यादों का पैगाम लेकर जाऊ, किसी के आँसूओ में किसी के गमो में डूबता जाऊ, किसी के तोड़ें से किसी के मोड़े से मुड़ जाऊ, कहने को तो मैं कागज कहा जाऊ। किसी के सजाने से किसी के बिगाड़े बिगड़ जाऊ, किसी के इश्क़ को किसी के राज़ को छिपाते जाऊ, किसी की आग से किसी की बात से मैं जलता जाऊ, कहने को तो मैं कागज कहा जाऊ। किसी की किस्मत को किसी ज़िन्दगी को मैं संवारता जाऊ, किसी के अर्श पर किसी के फर्श पर मैं पाया जाऊ, किसी के मकान में किसी की दुकान में मैं ही दिखता जाऊ, कहने को तो मैं कागज कहा जाऊ। किसी के सफर पर किसी की डगर पर मैं ही  तो साथ निभाता जाऊ, किसी की मंज़िल को किसी की राह को मैं ही तो दिखाता जाऊ, किसी के खाने में किसी के कूड़े में मैं ही  तो जाऊ, कहने को तो मैं कागज कहा जाऊ। कहने को तो मैं बस कागज कहा जाऊ।।।।।।।।